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Wednesday, November 16, 2016

अब जान ही लो कि सोनम गुप्ता बेवफा क्यों बनी? और बेवफाई के सवाल-जवाब नोटों पर क्यों ?

भारतीय मुद्रा में सोनम गुप्ता बेवफा वायरल

▶आज हर तरफ ये चर्चा है कि सोनम गुप्ता बेवफा है, लेकिन ये किसी को नहीं पता कि सोनम आखिर बेवफ़ा क्यों हुई? जानिए इसके पीछे की कहानी क्या है.

क्या सोनम गुप्ता सच में बेवफ़ा है? देश में नोट पर चर्चा के बाद आजकल ये सवाल अब हर हिंदुस्तानी की जुबान पर है. फेसबुक से लेकर ट्विटर तक और तमाम दूसरी सोशल साइट्स के पेज सोनम गुप्ता की वफ़ा और बेवफ़ाई से पटे पड़े हैं. नोट के लिए कतार में खड़े लोग हों या टीवी सीरियल से साजिशें सीखने वाली सास-बहुएं भी मोहल्ले भर की औरतों से पूछ रही हैं, कि क्या सच में सोनम बेवफ़ा है. नोटों की उलझन में फंसे बैंक कर्मचारी हों या दफ्तर में बैठे छोटे और बड़े बाबू सबकी चिंता यही है कि आखिर सोनम बेवफ़ा क्यों है?

विदेशी मुद्रा में सोनम गुप्ता का जिक्र....
10 के पुराने नोट से लेकर 2000 के नए नोट तक सोनम हर बार बेवफ़ा साबित की जा रही है. हिंदुस्तान से लेकर न्यूज़ीलैंड तक और अमेरिका से लेकर यूरोप तक. हर नोट पे बस एक ही नाम, सोनम गुप्ता बेवफ़ा है. लेकिन ये किसी को नहीं पता कि सोनम आखिर बेवफ़ा क्यों हुई?


सोनम गुप्ता बेवफा है !
इसके पीछे एक लंबी कहानी है. गर्ल्स कॉलेज में पड़ने वाली सोनम ने जब जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो चौदहवीं का चांद भी उसकी खूबसूरती के सामने ठहरता नहीं था. सोनम जब मोहल्ले से गुजरती थी तो गली के लड़के एक झलक की खातिर पलकें बिछाये रहते थे. सोनम छत पर पहुंच जाये तो सारा मोहल्ला पतंगों के बहाने से छतों की मुंढेरों पर चढ़ जाता था. सोनम जरा सा मुस्कुरा दे तो जमाने भर के लड़के बेहोश हो जाते थे.

कोई भी नोट नहीं छोड़ा लोगोंं ने हर प्रकार के नोट में सोनम गुप्ता का जिक्र
वक़्त के साथ सोनम का रूप रंग निखरता जा रहा था. उसके घर में चिट्ठियों के बण्डल जमा होने लगे थे. गुप्ता जी के घर की इकलौती बिटिया का खर्च सारा जमाना उठाने को तैयार था. इधर सोनम की दीवानगी बढ़ रही थी, उधर उसके नखरे भी बढ़ने लगे थे. गुप्ता जी की बिटिया मोहल्ले भर की आंखों का नूर हो गयी थी. दादी के जिगर का टुकड़ा जवान लड़को के दिल की धड़कन बन चुकी थी.


सोशल मीडिया में खूब वायरल सोनम गुप्ता
15 साल के छोरे से लेकर 56 साल के अंकल तक उसके इश्क़ में दीवाने थे. सोनम पर लाखों दिल कुर्बान थे, लेकिन सोनम की मजबूरी तो ये थी कि वो किसी एक को ही पसंद कर सकती थी. रोज़ रोज़ की चिट्ठियां तो सोनम सबकी पढ़ती भी नहीं थी. छत पर टहलते वक़्त सोनम की निगाहें एक लड़के पर रहती थीं. अपनी खिड़की से छुप-छुप कर उसका सोनम की तरफ देखना, सोनम को बहुत पसंद था. कनखियों से सोनम को देखने की उसकी अदा पर सोनम मर मिटी.

सोनम से नजरें चार हुईं तो उस लड़के की हिम्मत
सोशल मीडिया में खूब वायरल सोनम गुप्ता
बढ़ने लगी. डरपोंक से दिखने वाला इनकम टैक्स अफसर शर्मा जी के छोरे ने एक दिन 10 के नोट पे सोनम आई लव यू लिखकर सोनम की तरफ फेंक दिया. सोनम ने नोट उठाकर देखा, तो पहले तो शर्मा जी के लड़के को घूरकर देखा लेकिन फिर एक हंसी मुस्कान के साथ नोट जेब में रख लिया. बस इसी के साथ इश्क का नमक मुहब्बत की चाशनी में ऐसा लिपटा कि सोनम शर्मा जी के लड़के की जान बन गयी.

अब सोनम को शर्मा जी का लड़का हर रोज एक नोट पे आई लव यू लिखकर भेजने लगा. इस तरह सोनम की गुल्लक भी भरने लगी और इश्क भी हर रोज परवान चढ़ने लगा. अभी इश्क के मदरसे में दोनों नए नए तालिब थे. नयी जिन्दगी के नए सपने देख रहे थे. लेकिन इश्क और मुश्क कभी छुपता कहां है. एक दिन मास्टरसाहब ने दोनों को गुटरगूं करते पकड़ लिया और घर पे शिकायत पहुंच गयी. उस शाम दोनों की बहुत कुटाई हुई. लेकिन इश्क का भूत उतरा नहीं. तैश में आकर गुप्ता जी उस दिन शर्मा जी को भी औकात में रहने की नसीहत दे आये थे. बड़े अफसर ठहरे शर्मा जी अपमान का कड़वा घूंट पीकर रह गए थे.


सोनम और गुप्ता जी का लड़का बगावत पे उतारू हो गए. घर से भागने और जीने मरने के प्लान बनाने लगे. कोशिश थी किसी कीमत पर सात फेरे लेने की. अभी मामला प्लानिंग में था. लेकिन उनकी ज़िन्दगी में एक ऐसी तारीख आई जिसने सोनम को बेवफा बना दिया. वो तारीख थी 8 नवंबर 2016. टीवी पे देश के प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया कि आज से 500 और हजार के नोट बंद. सरकर ने काले धन वालों पे शिकंजा कसना शरू कर दिया. इनकम टैक्स की छापेमारी शुरू हो गयी और पहला शिकार गुप्ता जी बन गए. आज मौका शर्मा जी का था और आज उन्होंने गुप्ता जी से पुराना हिसाब चुकता कर लिया. बस यहीं से सोनम और शर्मा जी के लड़के में दूरियां पैदा हो गयीं और वो कम्बख्त अब नोटों पे लिखने लगा है कि सोनम गुप्ता बेवफ़ा है.



अबयज़ खान
लेखक पत्रकार हैं

#सोनम गुप्ता#नोट#डिमॉनेटाइजेशन#सोशल मीडिया#वायरल#प्यार#ब्रेकअप
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Wednesday, October 26, 2016

तो क्या तुलना करने आये थे माननीय प्रधानमंत्री बुंदेलखंड ?

बुंदेलखंड और वाराणसी के निवासियों में प्रधानमंत्री ने कर दिया पक्षपात *तो क्या तुलना करने आये थे माननीय प्रधानमंत्री 
युवा पत्रकार संजय गुप्ता ( डी डी न्यूज़ , उरई जालौन)  की पैनी कलम...
बुंदेलखंड के महोबा में देश के प्रधानमंत्री के पहले दौरे और उनकी विशाल रैली से बुंदेलखंडवासियों को जो उम्मीदें जगी थी, वो उस वक्त एक पल में काफूर हो गई जब माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के विकास की तुलना कर डाली । जबकि इसी दिन अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सात बड़ी परियोजनाओं की सौगात देकर अपने क्षेत्र में विकास की झड़ी लगा दी है  (जहाँ पर संसदीय क्षेत्र होने के कारण प्रधानमंत्री वर्ष पर कोई न कोई सौगात देते रहते है) ।

बुंदेलखंड का निवासी होने के चलते मेरे मन में भी उनका सम्बोधन सुनने की चाहत रही और 24 अक्टूबर 2016 को जब देश के प्रधानमंत्री ने महोबा में परिवर्तन रैली के द्वारा चुनावी आगाज किया, उससे कहीं न कहीं उम्मीद लगाईं जा रही थी कि प्रधानमंत्री के द्वारा बदहाल और सुखेग्रस्त बुंदेलखंड के लिए कोई न कोई बड़ी सौगात जरूर दी जायेगी जो शायद आगामी विधान सभा चुनावों में भाजपा के लिए प्रभावी दिखाई देगी । लेकिन उनके भाषण को सुनकर बुन्देलखंडवासियों को सिवाय निराशा के कुछ हासिल नहीं हुआ । माननीय के द्वारा मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के विकास की जो तुलना की गई उससे सभी लोग भली भांति परिचित थे , अपने एकपक्षीय भाषण में उन्होंने मध्य प्रदेश  भाजपा सरकार की जहाँ जमकर तारीफ की व् मध्य प्रदेश सरकार के विकास के पुलिंदे भी बांधे और वहां के किसानों के विकास की कहानी सुनाई तो वही उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के किसानों की दुर्दशा का जिम्मेवार प्रदेश की वर्तमान सपा और पूर्ववर्ती बसपा सरकार को बताया । जबकि इसी दिन माननीय प्रधानमंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में रैली की और वहां के विकास के लिए योजनाओं की झड़ी भी लगा दी, जिनमे लगभग पांच हजार करोड़ रुपये के व्यय होने का अनुमान है ।
इस पक्षपात को देखकर लग रहा है कि देश के प्रधानमंत्री के द्वारा उत्तर प्रदेश में चुनावी जो शंखनाद किया गया है उसका दुष्परिणाम न निकल आये  और बुंदेलखंड के निवासियों के द्वारा निराशा हाथ आने के बाद भाजपा के प्रत्याशियों को भी चुनाव में निराशा हाथ न लग जाए ।

देश की जनता के बीच स्वयं को सेवक के नाम से संबोधित करने वाले देश के माननीय  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बुंदेलखंड के निवासी इस तरह की उम्मीद की कल्पना नहीं कर रहे थे , किसानों की दुर्दशा जानकर भी उनके जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय जख्म कुरेद कर चले जाना और अपने संसदीय क्षेत्र में विकास की झड़ी लगा देना , इससे पक्षपात की नीति साफ़ दिखाई पड़ रही है ।
करीब एक घंटे के अपने भाषण में महोबा में माननीय प्रधानमंत्री के द्वारा किसानों, नौजवानो , और बेटियों की चर्चा की गई लेकिन मरहम के नाम पर सिर्फ बुंदेलखंड को मध्य प्रदेश व् उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के विकास की तुलना करने को दे गए ।
किसानों का पेट तुलनात्मक अध्ययन से नहीं , कोई बड़ी परियोजना से भरना था लेकिन विकास के नाम पर कोई भी योजना न देने से किसानों का पेट खाली का खाली ही रह गया  और यहाँ के निवासी प्रधानमंत्री के दौरे के बाद सिर्फ अपना मन मसोस कर रह गए है ।
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हिंदुत्व सिर्फ कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवनशैली है : सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर से कुछ ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है, जिसका भारतीय चुनावी प्रक्रिया और भारतीय संविधान पर दूरगामी असर पड़ सकता है।

धर्म के आधार पर वोट की अपील करने की मनाही के कानूनी दायरे पर विचार कर रही सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मंगलवार को एक बार फिर साफ किया कि वे हिन्दुत्व या धर्म के मुद्दे पर विचार नहीं करेंगे। फिलहाल कोर्ट के सामने 1995 का हिन्दुत्व का फैसला विचाराधीन नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें जो मसला विचार के लिये भेजा गया है उसमें हिन्दुत्व का जिक्र नहीं है। उन्हें विचार के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की व्याख्या का मामला भेजा गया है जिसमें धर्म के नाम पर वोट मांगने को चुनाव का भ्रष्ट तरीका माना गया है। कोर्ट इसी कानून की व्याख्या के दायरे पर विचार कर रहा है।

जानिये हिंदुत्व का यह पूरा मामला है क्या ? क्यों सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर बात करने से इनकार कर रही।  बात ये है की  इस मामले की जड़ें नब्बे के दशक के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से जुड़ी है , जिसमे हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने के आधार पर बम्बई हाई कोर्ट ने करीब दस नेताओं का चुनाव रद्द कर दिया था।

 हाई  कोर्ट ने इसे चुनाव का भ्रष्ट तरीका माना था, हालांकि 1995 में सुप्रीमकोर्ट ने हाई कोर्ट ने फैसला पलट दिया था। उस समय न्यायधीशों की तीन पीठ की बैठक में कहा था कि हिंदुत्व सिर्फ कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवनशैली है। यहाँ तक कि बीजेपी के नेता अमिताभ सिंह की याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित रह गयी।
अब एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने 1995 में आये फैसले पर दोबारा विचार की दरख्वास्त की।  उनकी मांग थी चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने से रोक जाए।  फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने हिदुत्व को नए सिरे से परिभाषित करने से इनकार करते हुए बीते मंगलवार को कहा कि अब वह इस मुकाम पर  की पुनर्समीक्षा नहीं करेगा।  इस मसले पर मुख्य न्यायधीश टीएस ठाकुर सहित सात सदस्यीय जजों की पीठ ने कहा , हम बड़ी बहस में नही जाना चाहेंगे कि हिंदुत्व क्या है और इसके मायने क्या है। हम अपने 21 बर्ष पुराने फैसले पर भी पुनर्विचार नहीं करेंगे। हम सिर्फ इस फैसले को संदर्भ के तौर पर पेश किये जाने वाले मामले की ही सुनवाई करेंगे। 

.....दीक्षा गुप्ता


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Tuesday, October 25, 2016

एडमिशन न लेने वाले स्कूलों पर कार्रवाई से इनकार...

इस मोर्डर्न जमाने में बच्चों का बेहतर भविष्य उनकी बेहतर स्कूली शिक्षा से बनता है , लेकिन अब हाल यह हो चुका है कि राजधानी लखनऊ के कई स्कूल ऐसे है जो बच्चों को अपने विद्यालय में एडमिशन ही नही देते है।

 ऐसे विद्यालयों पर पहले  करवाई का प्रावधान था जिससे बच्चों के माता-पिता को ज्यादा मुश्किलो का सामना नहीं करना पड़ता था , लेकिन राईट टू एजुकेशन (RTI) के तहत  बच्चों का  एडमिशन न लेने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई से जिला प्रशासन ने इन्कार कर दिया है । अफसरों का कहना है  कि आरटीआई एक्ट में एडमिशन के लिए पूरी गाइडलाइन दी गयी है , लेकिन इस पर कार्रवाई न करने वाले स्कूलों पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई का कोई प्रावधान नही है  । आलम यह है कि छः से अधिक स्कूलों ने एडमिशन देने से मना कर दिया है जिससे लगभग 200 पेरेंट्स भटक रहे है और जब जिला प्रशासन से सवाल किया तो वे यह कहकर पीछे हट गए की कार्यवाई का कोई प्रावधान  ही नही है। और वहीँ एक ओर  आरटीआई एक्टिविस्ट समीना बानो ने बताया कि आरटीआई में भले ही कार्रवाई का कोई नियम न हो, लेकिन स्कूलों  को शासन की ओर से आदेश जारी किया गया है। इस बयान के बाद भी अगर कोई स्कूल बच्चों को एडमिशन देने से मना कर रहा है तो यह शासनादेश का उल्लंघन समझा जाएगा और उन पर कड़ी  कार्यवाई भी की जा सकती है।  इन सब  से  तो यही  समझ आता है जिला प्रशासन जरूरतमंद  बच्चों के एडमिशन के लिए प्रयास ही नहीं कर रही है  बल्कि  उनकी शिक्षा में रोड़ा बनने का काम कर रही है।  लखनऊ के जिलाधिकारी का कहना है कि इस बारे मे कानूनी राय ली गयी है। इस एक्ट के तहत कोई भी  कार्रवाई का प्रावधान नही है और ऐसे में हम चाहते हुए भी स्कूलों  पर  कार्रवाई नहीं कर सकते।
दीक्षा गुप्ता

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